‘पंजाबी साहित्य में दलित कदम’ विशेषांक ‘युद्धरत आम आदमी’ 2001

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  • Published: 20/09/2014
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    26 नवम्बर, 2001, को ‘साहित्य अकादेमी’ दिल्ली के रवीन्द्र भवन सभागार में ‘पंजाबी साहित्य में दलित कदम’ पूर्णांक 58 का लोकार्पण श्री राजेन्द्र यादव ने किया। इसका संचालन श्यौराज सिंह ‘बैचेन’ ने किया। इसकी अध्यक्षता ‘पंजाबी साहित्य अकादमी’ के अध्यक्ष डाॅ. एस.एस. नूर तथा ‘साहित्य अकादेमी’ के सचिव के. सच्चिदानन्दन ने की। रमणिका जी ने अंक के प्रकाशन की पृष्ठभूमि पर वक्तव्य दिया। श्यौराज सिंह ‘बैचेन’ तथा महेश दर्पण ने इस विशेषांक पर आलेख पढ़े। डाॅ. ज्ञानसिंह बल, द्वारका भारती, बलवीर माधोपुरी तथा मोहन सिंह बाबा समेत पंजाब के कई वरिष्ठ लेखकों ने दिल्ली पहुंच कर इस कार्यक्रम में शिरकत की। प्रख्यात दलित लेखक एवं नाटकरकार चरण सिंह सिद्धू, ने भी शिरकत की। कमलेश्वर जी और मैनेजर पांडेय ने इस प्रयास को बहुत सराहा। इस कार्यक्रम में की गईं कुछ महत्त्वपूर्ण टिप्पणियां निम्न हैंµ


    विशेषांक के लोकार्पण सह वैचारिक संगोष्ठी में विशिष्ट अतिथि कमलेश्वर ने कहा-‘‘जैसे-जैसे अन्याय और शोषण बढ़ते जाएंगे दलित-चेतना का विकास होता जाएगा। दलित साहित्य में अनुभव की दुनिया बड़ी महत्वपूर्ण और साहित्य में अनुभव की दुनिया का बड़ा महत्व है। साहित्य के सौन्दर्य-शास्त्र के पैमाने पर मनुष्य के अंतरतम की रचना कभी पूरी की पूरी नहीं उतरेगी। मैं यह स्वीकार करता हूं कि जब से मराठी एवं हिन्दी के दलित साहित्यकारों की आत्मकथाएं मैंने पढ़ी हैं, तब से लग रहा है कि अपनी तमाम संवेदनाओं के बावजूद मैं वैसा दलित साहित्य नहीं रच सकता क्योंकि वहां जो यातनाएं और उत्पीड़न हैं वह मेरे अनुभव का हिस्सा कभी नहीं रहीं। दरअसल दलित साहित्य में पूरकता की आवश्यकता है, परिवर्तनकामी दलित साहित्य अपने अनुभव सत्य के साथ-साथ उसके विपरीत के सच और उसके प्रतिरोध की चेतना को भी विकसित करे, तभी उसकी यात्रा आगे बढ़ेेगी। ‘युद्धरत आम आदमी’ की संपादिका रमणिका गुप्ता बधाई की पात्र हैं। रमणिका जी द्वारा हिन्दी में विभिन्न भाषाओं के दलित साहित्य को प्रकाश में लाने का काम ऐतिहासिक महत्व का है। जिस कार्य को मैं और राजेन्द्र यादव नहीं कर पाए उसे रमणिका जी ने किया।’’ संगोष्ठी की शुरूआत में विशेषांक की संपादिका रमणिका गुप्ता ने रमणिका फाउंडेशन और ‘युद्धरत आम आदमी’ पत्रिका के लक्ष्य को स्पष्ट करते हुए कहा -‘‘हमारा ध्येय, खासकर हाशिए पर रखी दी गईं जमातों को ऐसा मंच प्र्रदान करना है जहां वे लोग अपनी बात खुद कह सकें और कर सकें। उस पर अमल कर और करवा सकें। एक नीतिगत फैसले के तहत हमने यह तय किया कि ऐसे विशेषांकों में हम केवल दलित और आदिवासी का लिखा ही प्रकाशित करेंगे ताकि उनकी अपनी सोच सामने आ सके और उनकी समस्याओं के समाधान भी उनके माध्यम से ही आएं। मुख्यधारा का वर्तमान हिन्दी साहित्य एक अंतिम बिंदु तक पहुंच चुका है और वह बार-बार अपनी बातें दोहराने लगा है। उसके अनुभव भी बासी पड़ चुके हैं, इसलिए दलितों-आदिवासियों की ये पीढ़ी जिन अनुभवों के साथ लेखन कर रही है वह अनुभव मूलधारा के साहित्यकारों के पास नहीं है। ‘‘दलित लेखन अपना एक महत्व रखता है और नई संस्कृति का द्योतक है।’’


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